दावानल, सिस्टम के दावे धुआं-धुआं, प्रदेश में सबसे अधिक वनाग्नि से प्रभावित होने वाला जिला पौड़ी

प्रदेश में दूसरा सबसे अधिक वनाग्नि से प्रभावित होने वाला जिला पौड़ी गढ़वाल है। तीन वर्षों में 325 घटनाएं हुईं। सैकड़ों हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल को नुकसान पहुंचा है।

प्रदेश में जंगल की आग की घटनाएं एक चुनौती रही हैं। वनाग्नि नियंत्रण के लिए संसाधनों को बढ़ाने के तमाम दावों के बीच जंगल की आग की घटनाएं लगातार बढ़ हो रही हैं। इससे पौड़ी जिला भी अछूता नहीं है। हालात ये हैं कि बीते दो वर्षों से राज्य में दूसरे नंबर पर सबसे अधिक वनाग्नि की घटनाएं इसी जिले में रिपोर्ट हो रही हैं।

जनपद में दो वन प्रभाग हैं, जिनमें सिविल सोयम पौड़ी वन प्रभाग भी है, कर्मचारियों के मामले में इस डिवीजन की भी हालत गढ़वाल प्रभाग जैसी ही है। यहां पर रेंजर और वन आरक्षी के पद खाली हैं। तीन रेंज में तो वाहन तक नहीं हैं। पौड़ी जिले में वनाग्नि की घटनाओं पर विजेंद्र श्रीवास्तव की रिपोर्ट।

425 हेक्टेयर में जैव विविधता हुई प्रभावित

पौड़ी जिले में तीन 2023 से 2025 तक वनाग्नि के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2023 में प्रदेश में पौड़ी जिला तीसरे स्थान पर था, जहां पर सबसे अधिक वनाग्नि की घटना हुईं। 2024 और 2025 में यह दूसरे नंबर पर आ गया है। तीन वर्ष में 325 घटनाएं हुईं, 425 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल में जैव विविधता प्रभावित हुई है। वनाग्नि के मद्देनजर सिविल सोयम पौड़ी, गढ़वाल वन प्रभाग पौड़ी और नागदेव रेंज सबसे अधिक संवेदनशील है। इस वर्ष भी 15 फरवरी से फायर सीजन शुरू हुआ है, इसके बाद से सिविल सोयम प्रभाग में 19 घटनाओं में करीब 11 हेक्टेयर और गढ़वाल वन प्रभाग में आठ घटनाओं में 21 हेक्टेयर जंगल को नुकसान पहुंच चुका है। यहां पर अप्रैल के समय तुलनात्मक तौर पर घटनाएं अधिक हुईं।

पौड़ी में तीन वर्ष में वनाग्नि

वर्ष-घटना- प्रभावित क्षेत्रफल

2023-111-176.74 हेक्टेयर

2024-167-209.13 हेक्टेयर

2025-47-50.46 हेक्टेयर


पर्याप्त कर्मचारी नहीं, वाहन का भी टोटा

वन विभाग में हर साल 15 फरवरी 15 जून तक फायर सीजन होता है। उससे पहले जंगल में फायर लाइन की सफाई, कंट्रोल बर्निंग की जाती है। जिला फॉरेस्ट फायर प्लान बनाने से लेकर अन्य विभागों का सहयोग लेने की बात होती है।

हाल के वर्षों में मॉडल क्रू स्टेशन बनाने, लीफ ब्लोअर देने से लेकर अन्य कदम उठाए गए हैं। पर हालत यह है कि सिविल सोयम वन प्रभाग की छह रेंज में रेंजर की जगह डिप्टी रेंजर ही तैनात हैं। वन आरक्षी के 26 पद रिक्त हैं। तीन रेंज में तो वाहन तक नहीं हैं। फायर सीजन में किराए पर वाहन लिया जाता है।

कमेड़ा ग्राम सभा के पास जंगल पिरुल से पटा

वनाग्नि का एक बड़ा कारण चीड़ की पत्ती पिरुल भी है। पिरुल को एकत्र करने और भुगतान की योजना शुरू की गई है। पर हालत यह है कि कमेड़ा गांव के पास जंगल में पिरुल से भरा हुआ है। यहां पर पानी संग्रह के लिए संरचना बनाई गई है, उसमें पिरुल भरा हुआ था।

जंगल की आग का कारण

वन संरक्षक आकाश वर्मा बताते हैं कि प्रभाग में एक बड़े हिस्से में चीड़ का जंगल है। इसके अलावा पानी कम होने से शुष्कता भी अधिक रहती है। इससे भी आग का खतरा बढ़ता है। वर्ष-2024 में आग बुझाने के लिए हेलिकाप्टर की मदद लेनी पड़ी थी। इसके साथ ही वन महकमा जंगल की आग का एक कारण मानवजनित भी मानता है। डीएफओ पवन नेगी बताते हैं कि कई बार इरादतन भी कुछ लोग आग लगा देते हैं या असावधानी के कारण आग लग जाती है। कई बार खेतों को साफ करने के दौरान भी आग लगाई जाती है, जो कि वहां से जंगल तक पहुंच जाती है। इसी तरह अन्य भी मानवजनित कारण भी हैं।

दावा: नई पहल की, संसाधन बढ़ाए गएवन संरक्षक गढ़वाल वृत्त आकाश वर्मा बताते हैं कि वनाग्नि नियंत्रण को कई प्रयास किए गए हैं। इसमें लीसा विदोहन करने वाले ठेकेदारों को जंगल में पिरुल को स्वयं सहायता समूह, स्थानीय लोगों के माध्यम से एकत्र कराने पर दो सौ रुपये प्रति क्विंटल भुगतान किया जाएगा। इस पिरुल का इस्तेमाल चैक डैम बनाने में होगा। पिरुल से ब्रिकेट बनाने को दो यूनिट स्थापित हो चुकी है। डीएफओ पवन नेगी बताते हैं कि फायर सूट वन कर्मियों को दिया गया है। प्रभाग स्तर पर अन्य संसाधनों को जुटाया गया है। 100 फायर वॉचर को प्रभाग में तैनात किया गया है। लगातार प्रयास जारी है, इन प्रयासों से काफी मदद मिली है।

15 फरवरी के बाद वनाग्नि

रीजनघटना-प्रभावित क्षेत्रफल
गढ़वाल207161 हेक्टेयर
कुमाऊं04847 हेक्टेयर
वन्यजीव क्षेत्र2312.9 हेक्टेयर
कुल 278 घटना , 220.47 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्रभावित

वनाग्नि नियंत्रण के लिए एनडीएमए के माध्यम से 16 करोड़ से अधिक की राशि मिली है। इससे पौड़ी जिले में कार्य होगा। साथ ही वन कर्मियों को फायर सूट दिया गया है। पिरुल एकत्र करने के साथ उसका भुगतान का कार्य भी शुरू कर दिया गया है।  – सुशांत पटनायक, मुख्य वन संरक्षक, वनाग्नि नियंत्रण

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